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आजकल व्हाटसअप पर एक पोस्ट वायरल हो रही है जिसमें कहा गया है रामायण में यह पहले से ही लिखा गया है कि कोरोना जैसी एक महामारी होगी और बहुत से लोग मारे जाएंगे और इसकी सिर्फ एक ही दवा है समाधि, प्रभु भक्ति अर्थात लाक डाउन।।
आइए विस्तृत रुप से इस तथ्य की सच्चाई को समझने का प्रयास करते हैं।
सबसे पहले जो अर्थ निकालकर प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है उसके तथ्यों को समझते हैं। आज की स्थिति में जब कोरोना महामारी का कोई औपचारिक विकल्प नहीं है तो एसे में लाक डाऊन में रहना ही एकमात्र विकल्प है। जिसको वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही सही मानकर विश्व के अनेकों देशों ने लाक डाउन का अनुसरण किया है। अब बात करते हैं लाक डाउन में घर में रहकर "खाली दिमाग शैतान का घर " न हो इसलिए इंसान को कुछ ना कुछ अपने सामृथ्य और विद्वता अनुसार करते रहना चाहिए। इस समय का उपयोग ज्ञान अर्जित करने में अर्थात अपने आदि ग्रंथों को पढने में उनका अनुसरण करने में लगाना एक अच्छा विकल्प है क्योंकि आज के भौतिकतावादी युग में हम समय के अभाव में या भाग दौड के कारण अपने ग्रंथों से दूर हो गये हैं।
इसलिए जो समाधान दिया गया है वह संपूर्ण वैज्ञानिक है और उपयोगी भी है
अब आइए उस चौपाई और दोहे को समझते हैं जिसके संदर्भ से कोरोना की उत्पत्ति की भविष्यवाणी को आध्यात्मिक ग्रंथ रामायण से जोड़ा गया है। यह संदर्भ रामचरित मानस में उत्तरकाण्ड के गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तर" प्रसंग से लिया गया है ।
प्रसंग के अनुसार पक्षीराज गरुड़जी काकभुशुण्डि जी से अपने सात प्रश्नों के उत्तर पूछते हैं।
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥
बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥
भावार्थ:-हे नाथ! हे धीर बुद्धि! पहले तो यह बताइए कि सबसे दुर्लभ कौन सा शरीर है फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचार कर संक्षेप में ही कहिए॥
संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु॥
कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला॥
भावार्थ:-संत और असंत का मर्म (भेद) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिए। फिर कहिए कि श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे महान् पुण्य कौन सा है और सबसे महान् भयंकर पाप कौन है और फिर मानस रोगों को समझाकर कहिए।
(काकभुशुण्डिजी ने कहा-) हे तात अत्यंत आदर और प्रेम के साथ सुनिए। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ॥
नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥
नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥
भावार्थ:-मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। वह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है॥
सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर
काँच किरिच बदलें ते लेहीं। कर ते डारि परस मनि देहीं॥
भावार्थ:-ऐसे मनुष्य शरीर को धारण (प्राप्त) करके भी जो लोग श्री हरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं॥
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं
पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥
भावार्थ:-जगत् में दरिद्रता के समान दुःख नहीं है तथा संतों के मिलने के समान जगत् में सुख नहीं है। और हे पक्षीराज! मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यह संतों का सहज स्वभाव है॥
संत सहहिं दुख पर हित लागी। पर दुख हेतु असंत अभागी॥
भूर्ज तरू सम संत कृपाला।पर हित निति सह बिपति बिसाला
भावार्थ:-संत दूसरों की भलाई के लिए दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए। कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिए भारी विपत्ति सहते हैं (अपनी खाल तक उधड़वा लेते हैं)॥
सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाई बिपति सहि मरई॥
खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥
भावार्थ:-किंतु दुष्ट लोग सन की भाँति दूसरों को बाँधते हैं और (उन्हें बाँधने के लिए) अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिए, दुष्ट बिना किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं॥
पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं
दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥
भावार्थ:-वे पराई संपत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। दुष्ट का अभ्युदय (उन्नति) प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु के उदय की भाँति जगत के दुःख के लिए ही होता है॥
संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी॥
परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा॥
भावार्थ:-और संतों का अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चंद्रमा और सूर्य का उदय विश्व भर के लिए सुखदायक है। वेदों में अहिंसा को परम धर्म माना है और परनिन्दा के समान भारी पाप नहीं है॥
हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्र पाव तन सोई॥
द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि॥
भावार्थ:-शंकरजी और गुरु की निंदा करने वाला मनुष्य (अगले जन्म में) मेंढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेंढक का शरीर पाता है। ब्राह्मणों की निंदा करने वाला व्यक्ति बहुत से नरक भोगकर फिर जगत् में कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है॥
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी॥
होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥
भावार्थ:-जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निंदा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निंदा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोह रूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञान रूपी सूर्य जिनके लिए अस्त हो गया रहता है॥
आगे काकभुशुण्डि जी मानस रोगों अर्थात मन के रोगों के विषय में व्याख्यान करते हुए कहते हैं कि कि जैसे शरीर में कफ, वात एवं पित्त दोष होते हैं। ऐसे ही मन में काम, क्रोध और लोभ दोष रूप में विद्यमान रहते हैं। इन्हें ही मानस रोग कहते हैं। कागभुशुण्डि जी ने कहा कि जैसे कफ, वात, पित्त को दूर नहीं किया जा सकता है, वैसे ही इन तीनों दोषों को भी मन से दूर नहीं किया जा सकता है। प्रभु के चरणों में ध्यान लगाकर जीवात्मा सिर्फ इनके संतुलन का काम कर सकता है। इसलिए हमें प्रभु कृपा पाने के लिए सच्चे मन से प्रभु का ध्यान करना चाहिए। इससे इन तीनों दोषों का संतुलन बनाते हुए प्रभु शरणागत पा सके।
सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥
सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥
भावार्थ:-जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात! अब मानस रोग सुनिए, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं॥
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥
काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥
भावार्थ:-सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है॥
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई॥
बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना॥
भावार्थ:-यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जाएँ), तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनता से प्राप्त (पूर्ण) होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं, उनके नाम कौन जानता है (अर्थात् वे अपार हैं)॥
ममता दाद है, ईर्षा (डाह) खुजली है, हर्ष-विषाद गले के रोगों की अधिकता है (गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं), पराए सुख को देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है॥
अहंकार अत्यंत दुःख देने वाला डमरू (गाँठ का) रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसों का) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदर वृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं॥ मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँ तक कहूँ॥
एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।
पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि॥
एक ही रोग के वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत से असाध्य रोग हैं। ये जीव को निरंतर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशा में वह समाधि (शांति) को कैसे प्राप्त करे?॥
नियम, धर्म, आचार (उत्तम आचरण), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों औषधियाँ हैं, परंतु हे गरुड़जी! उनसे ये रोग नहीं जाते॥
निष्कर्ष - अगर मानस में दी गई चौपाइयों के व्याख्यान को शुद्ध रूप से देखा जाए तो इन चौपाइयों को इसमें मानस रोगों अर्थात (मन में काम, क्रोध और लोभ) जैसे दोषों की व्याख्या की गयी है। इनमें किसी भी तरह से कोरोना महामारी के प्रकोप के विषय में नहीं कहा गया है। अपितु कुछ विमूढ़ लोगों द्वारा शाब्दिक अर्थ को भ्रामक रूप देकर पेश करते हुए इस निरर्थक रूप से भ्रामित संदेश के साथ पेश किया गया है ।
और हम इसकी प्रमाणिकता का खंडन करते हैं।
सभी बंधुजनो से हमारा निवेदन है कि कृप्या करके एसी किसी अफवाह , मैसेज या वीडियो पर ध्यान न दें अपितु वैज्ञानिक प्रमाणिकता के आधार पर सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करें।
ईश्वर की कृपा से जल्दी ही इस समस्या का भी निदान भी मिल ही जायेगा ।
🚩जय श्रीराम 🚩
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मांस बेचने वाले लोग इसका अपशिष्ट पंख, मल मूत्र, खून आदि नहरों, नदियों में बहाते हैं, वही पानी हम पीते हैं, पशु पीते हैं और उसी पानी से किसान भी सिंचाई करता है और फल सब्जियाँ धोता है..
यह पानी में कोरोना आदि खतरनाक वायरस को फैला सकता है.. सरकार को चाहिये कि जब तक देश पूर्णतया कोरोना मुक्त नहीं हो जाये सभी बूचड़खाने और मांस की बिक्री पर ओरण रूप से प्रतिबंध रहे.. उसके बाद भी यह सुनिश्चित करें कि पशुओं का अवशिष्ट नदियों व नहरों में नहीं बहाया जायें..
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सहमत हैं तो पोस्ट को अपनी वाल पर कॉपी करें और SS लेकर अपने जिलों के कलेक्टर, CMO, PMO, स्वास्थ्य मंत्रालय, मीडिया आदि को ट्वीट कर जनहित के इस विचार / चिंता को अभियान बना दीजिये.. 🙏
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Physiology or Medicine मैं नोबेल पुरस्कार जीतने वाले जापान के प्रोफेसर डॉक्टर टासुकू होंजो ने आज मीडिया के सामने यह बोल कर सनसनी फैला दी कि कोरोना वायरस प्राकृतिक नहीं है यदि प्राकृतिक होता पूरी दुनिया में यह यूं तबाही नहीं मचाता क्योंकि विश्व के हर देश में अलग अलग टेंपरेचर होता है प्रकृति के अनुरूप है यदि यह कोरोनावायरस प्राकृतिक होता कोचीन जैसे अन्य देश जहां जैसा ही टेंपरेचर है या वातावरण है वहीं दबंग मचाता। यह स्विट्जरलैंड जैसे देश मैं फैल रहा है ठीक वैसा ही यह रेगिस्तानी इलाकों में भी फैल रहा है जबकि यह प्राकृतिक होता तो ठंडे स्थानों पर फैलता परंतु गर्म स्थानों पर जाकर यह दम तोड़ देता । मैंने जीव जंतु और वायरस पर 40 साल रिसर्च किया है यह प्राकृतिक नहीं है। यह बनाया गया है और यह वायरस पूरी तरह से आर्टिफिशियल है। चीन की मुहं लेबोरेटरी में मैंने 4 साल काम किया है उस लेबोरेटरी के सारे स्टाफ से में पूरी तरह परिचित हूं कोरोना हादसे के बाद से मैं सब को फोन लगा रहा हूं परंतु सभी मेंबर्स के फोन बंद 3 महीने से आ रहे हैं । अब पता चल रहा है कि सारे लेब टेक्नीशियन की मौत हो गई है।
मैं आज तक की अपनी सारी जानकारियों और रिसर्च के आधार पर यह 100% दावे के साथ कह सकता हूं: की कोरोना प्राकृतिक नहीं है चमगादड़ से नहीं खेला है यह चीन ने बनाया है यदि मेरी बात जो मैं आज बोल रहा हूं वह आज या मेरे मरने के बाद भी झूठी हो तो मेरा नोबेल पुरस्कार सरकार वापस ले सकती है परंतु चीन झूठ बोल रहा है और यह सच्चाई एक दिन सबके सामने आएगी।
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Raj Purohit Guru
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