यह पोस्ट कोरोना के बारे में नहीं है...
एन्टीजेनिक ड्रिफ्ट और एन्टीजेनिक शिफ्ट!
वायरस क्यों फैलते हैं?
सामान्य फ्लू, कॉमन कोल्ड हर साल आता है। क्यों?
जब एक बार आपको कोई भी इन्फेक्शन हो जाता है तो शरीर उसके प्रति इम्युनिटी या प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है।
फ्लू वायरस आपको एक बार इन्फेक्ट करते हैं या आप फ्लू वैक्सीन ले लेते हैं, आपमें इम्युनिटी आ जाती है।
उधर वायरस अपने जेनेटिक स्ट्रक्चर में बदलाव की R&D शुरू कर देता है।
अगले साल वह मामूली बदलाव के बाद नये एन्टीजेनिक स्ट्रक्चर के साथ वापस आ जाता है।
इसे कहते हैं एन्टीजेनिक ड्रिफ्ट। यह हर साल होता है।
पर कभी- कभी वायरस अपने स्ट्रक्चर में बहुत अधिक बदलाव करने में सफल हो जाता है।
ऐसा बहुत वर्षों में एक बार होता है।
मानव शरीर में इस नए वायरस के लिये कोई एन्टीजेनिक मेमोरी नहीं होती।
ऐसी अवस्था में यह वायरस बहुत तेजी से फैलता है और पूरी दुनिया मे महामारी या पैन्डेमिक फैलाता है।
इसे कहते हैं एन्टीजेनिक शिफ्ट।
इसका पिछला उदाहरण था 1918 का इन्फ्लूएंजा पैन्डेमिक या स्पैनिश फ्लू।
युद्ध और आक्रमण कोई नई चीज नहीं हैं। शत्रु आते रहते हैं, युद्ध करते हैं। शासन पर कब्जा करते हैं, और राज करते हैं।
भारत में भी राजाओं के बीच युद्ध होते रहते थे। जनता अपनी जिंदगी जीती रहती थी।
उसके लिये "बिज़नेस ऐज युजुअल" होता था।
इसी से यह विचार निकला होगा - "कोउ नृप होय हमहिं का हानी...?"
पर तब आया इस्लाम।
यह अपनी मूल स्वरूप में बिल्कुल नई चीज था। मानवता के इतिहास ने ऐसी चीज पहले कभी नहीं देखी थी।
एक सेना के रूप में यह युद्ध के मैदान तक नहीं रुका। यह आपके घरों में घुस आया।
सिर्फ सैनिकों की ही नहीं, बच्चों और बूढ़ों की हत्या, स्त्रियों का बलात्कार, दास बनाना और बेचना...
मानवता इसके लिये तैयार नहीं थी। हिन्दू तो बिल्कुल नहीं।
यह आपके घर में ही नहीं, आपके मस्तिष्क में घुसने का आग्रह रखता था।
आपकी पूजा पद्धति, आपकी आस्था तक को पारासाईटाइज करने आया था।
हिन्दू समाज ने इसका भरपूर प्रतिकार किया।
युद्ध के मैदान में तो किया ही, समाज में भी इसका प्रतिकार किया।
मलेच्छ तिरस्कृत, अस्पृश्य हो गया। उससे कोई भी सामाजिक संपर्क स्वीकार्य नहीं था।
उसकी संस्कृति की कोई भी चीज चिमटे क्या, बाँस से भी छूने लायक नहीं थी।
उसका खान-पान रहन- सहन, उसका छुआ पानी भी स्वीकार्य नहीं था।
यह एक एन्टीजेनिक मेमोरी थी एक आक्रामक असभ्य कुसंस्कृति के प्रति।
पर वह पिछले सत्तर वर्षों में धीरे- धीरे नष्ट हो रही थी।
लोगों ने मलेच्छों को अपने सामाजिक जीवन में स्वीकार कर लिया था।
आज फिर आपके पास एक और अवसर आया है उस मलेच्छ कुसंस्कृति को पहचानने का, उससे अपने को दूर करने का।
आज जब पूरा देश कोरोना संक्रमण को लेकर जागरूक है। संयम और अनुशासन का पालन कर रहा है तो हमारे सामने एक समुदाय है जो जानबूझ कर उस महामारी को फैलाने में लगा हुआ है।
शाहीनबाग में धरने प्रदर्शन में बैठा है। अपने धर्मस्थलों में भीड़ लगा रहा है.
इस कोरोना महामारी से भी कुछ पॉजिटिव निकल कर आ सकता है तो वह है यह एक बात।
यह समय है हिन्दू समाज के लिए अपनी एन्टीजेनिक मेमोरी को पुनर्जागृत करने का।
याद करने का कि एक समय सामाजिक स्तर पर हमने इस सांस्कृतिक महामारी से कैसे दूरी बनाई थी. कैसे खुद को बचाया था।
शाहीनबाग वाले जो कह रहे हैं कि कोरोना तो कुरान से निकला हे, हमारा क्या कर लेगा?
इस वक्तव्य को उनकी मूर्खता समझ कर उसका उपहास करना विवेकशून्यता है। इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करना आवश्यक है।
कोरोना को फैलाने को तत्पर इस दूसरी सांस्कृतिक महामारी से बचें।
इससे सोशल-इकोनॉमिक दूरी बनाये। उनसे कोई लेनदेन, कोई व्यवहार, कोई सामाजिक संपर्क न रखें।
पूरा प्रयास रखें कि वे संदिग्ध कोरोना मानव-बम आपके संपर्क में न आने पायें।
उनसे वैसा ही व्यवहार करें जैसा आपकी दादी या परदादी किया करती थीं। ज्यादा आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष, बुद्धिजीवी , तार्किक तथा संविधानवादी बनने का मूर्खतापूर्ण प्रयास हमारे पूर्वजों के एक हजार वर्षों के रक्तरंजित बलिदान को मिट्टी में मिला देगा।
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